श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12
बाँके बिहारी जी और पर्दे का रहस्य: वृंदावन की एक प्रसिद्ध लोककथा
वृंदावन आते ही हर भक्त के मन में एक सवाल जरूर उठता है—
बाँके बिहारी मंदिर में भगवान के सामने बार-बार पर्दा क्यों डाला जाता है?
जब आप गर्भगृह में खड़े होते हैं और अचानक दर्शन रुक जाते हैं, तो यह अनुभव सामान्य मंदिरों से बिल्कुल अलग लगता है। अधिकतर लोग कहते हैं कि बाँके बिहारी जी की दृष्टि अत्यंत प्रभावशाली है, इसलिए भक्त लगातार दर्शन नहीं कर पाते। यह बात आस्था के स्तर पर सही मानी जाती है, लेकिन इसके पीछे जुड़ी एक पुरानी लोककथा इस परंपरा को और भी गहरा अर्थ देती है।
तथ्य स्पष्टिकरण:
यह कथा ऐतिहासिक दस्तावेज़ों या शास्त्रों में नहीं मिलती, बल्कि वृंदावन की प्रचलित लोकपरंपराओं और संत-संवादों में सुनी जाती है।
राजस्थान की राजकुमारी और वृंदावन की भक्ति
कहा जाता है कि कई शताब्दियों पहले राजस्थान की एक अत्यंत धर्मनिष्ठ राजकुमारी वृंदावन आई थीं। उनका जीवन भोग-विलास से दूर, पूरी तरह श्रीकृष्ण भक्ति में रमा हुआ था। वृंदावन पहुँचकर जब उन्होंने पहली बार बाँके बिहारी जी के नेत्रों में देखा, तो वह क्षण केवल दर्शन का नहीं था—वह पूर्ण आत्मिक मिलन का अनुभव था।
उनकी भक्ति में कोई मांग नहीं थी, कोई इच्छा नहीं थी। वह बस प्रेम था—निर्मल, निस्वार्थ और गहन।
जब भक्ति ने तोड़ दी मर्यादा की सीमा
लोककथा के अनुसार, राजकुमारी का प्रेम इतना तीव्र था कि बाँके बिहारी जी अपने आसन से आगे बढ़ने लगे, मानो अपने भक्त के साथ वृंदावन छोड़कर राजस्थान जाना चाहते हों। मंदिर के सेवायतों ने यह असामान्य परिवर्तन महसूस किया और वे भयभीत हो उठे।
उन्होंने भगवान से विनती की—
“हे ठाकुर जी, वृंदावन को मत छोड़िए। यह आपकी लीला भूमि है।” पर्दे की परंपरा कैसे शुरू हुई?
कथा कहती है कि भगवान भक्तों की प्रार्थना से द्रवित हुए, लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि भक्त और भगवान के बीच भावनाओं का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यदि दर्शन निरंतर और बिना विराम के होंगे, तो भक्ति इतनी तीव्र हो सकती है कि मर्यादा टूट जाए।
इसी संतुलन के लिए मंदिर में पर्दा डालने की परंपरा शुरू की गई।
पर्दा केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच भाव का विराम है।
बाँके बिहारी मंदिर: परंपराओं से अलग, भावनाओं से जुड़ा
बाँके बिहारी मंदिर की विशेषता यही है कि यहाँ कई सामान्य मंदिर नियम लागू नहीं होते।
यहाँ—
घंटी नहीं बजाई जाती
औपचारिक आरती नहीं होती
और दर्शन बार-बार रोके जाते हैं
क्योंकि बाँके बिहारी जी को यहाँ राजा नहीं, बाल सखा माना जाता है।
वृंदावन की भक्ति विधि से नहीं, भाव से चलती है।