डॉ.
राधेश्याम शुक्ल: अयोध्या से जनजातीय भारत तक ज्ञान की अनवरत यात्रा
नमस्कार।
आज हम डॉ. राधेश्याम
शुक्ल के जीवन और
उनकी बौद्धिक यात्रा पर विचार करेंगे।
उपलब्ध जानकारी उनके अपने अनुभवों,
चिंतन और ज्ञान की
निरंतर खोज से जुड़ी
है — एक विद्वान, पत्रकार,
इतिहासकार और जिज्ञासु शोधकर्ता
के रूप में। हमारा
उद्देश्य यह समझना है
कि अयोध्या का उनका अनूठा
बचपन, विज्ञान के प्रति उनका
आकर्षण, और ज्ञान की
प्यास ने उनके बहुआयामी
व्यक्तित्व को किस तरह
आकार दिया।
यह कहानी इस बात का
उदाहरण है कि किसी
व्यक्ति का प्रारंभिक अनुभव,
परिवेश और आंतरिक जिज्ञासा
मिलकर उसकी सोच और
विकास की दिशा तय
कर सकते हैं।
बचपन
के एकांत से लेकर विविध
विषयों के अध्ययन तक
की यह यात्रा वाकई
प्रेरणादायक है।
डॉ. शुक्ल का जन्म अयोध्या
में श्रीराम जन्मभूमि के पास हुआ
था। जब वे लगभग
चार वर्ष के थे,
तब उनका परिवार रामकोट
मोहल्ले के मंदिर ‘छविनाथ
भवन’ में आकर रहने
लगा। उनका बचपन साधुओं
और मंदिरों के बीच बीता
— खेलने की जगह भी
जन्मभूमि परिसर ही हुआ करती
थी। जगन्नाथ मंदिर के एक बुजुर्ग
महंत उन्हें भागवत, विष्णु और मार्कंडेय पुराणों
की कहानियाँ सुनाया करते थे।
वे कहते हैं कि
उस समय वे इन
कथाओं को बस सुनते
रहते थे, बिना अधिक
समझे, लेकिन उन अनुभवों ने
उनके भीतर गहराई से
प्रभाव छोड़ा। बिजली के अभाव और
अयोध्या के शांत वातावरण
ने उनमें एक अनोखी आत्मानुभूति
को जन्म दिया। यही
वातावरण आगे चलकर उन्हें
केवल विज्ञान ही नहीं, बल्कि
मानवता, दर्शन और संस्कृति की
ओर भी प्रेरित करता
गया।
उनकी
प्रारंभिक शिक्षा सुंदर सदन मंदिर के
एक प्राथमिक विद्यालय से हुई। परिवार
चाहता था कि वे
संस्कृत पढ़ें, लेकिन उन्होंने विज्ञान और अंग्रेज़ी पढ़ने
पर ज़ोर दिया — क्योंकि
उन्हें लगता था कि
विश्व के रहस्यों को
समझने का मार्ग वहीं
से जाता है।
सर आइज़ैक न्यूटन की जीवनी ने
उनमें वैज्ञानिक जिज्ञासा की ज्योति जलाई।
उन्होंने
बीएससी में फिजिक्स, केमिस्ट्री
और मैथ्स पढ़ा, जिसमें फिजिक्स उनका प्रिय विषय
रहा। यद्यपि एमएससी अधूरी रह गई, लेकिन
उनका स्वाध्याय जारी रहा और
वे पत्रकारिता की ओर मुड़
गए।
पत्रकारिता
ने उन्हें समाज से जोड़ा,
लेकिन उनके भीतर यह
एहसास जागा कि ब्रह्मांड
को समझने के लिए मानव
सभ्यता, इतिहास और संस्कृति को
भी जानना आवश्यक है। इस विचार
ने उन्हें प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व और संस्कृति में
एमए और फिर पीएचडी
करने के लिए प्रेरित
किया।
उनकी
बौद्धिक यात्रा केवल डिग्रियों तक
सीमित नहीं रही — यह
ज्ञान की निरंतर खोज
थी। वे विज्ञान, साहित्य,
दर्शन, राजनीति, इतिहास, धर्मशास्त्र, और जनजातीय जीवन
के अध्ययन से एक समग्र
दृष्टिकोण विकसित कर रहे थे।
धर्मशास्त्र
के संदर्भ में पांडुरंग वामन
काणे की “धर्मशास्त्र का इतिहास” ने उन्हें गहरी
अंतर्दृष्टि प्रदान की।
विज्ञान जहाँ भौतिक जगत
की खोज है, वहीं
भारतीय दर्शन चेतना की खोज — और
डॉ. शुक्ल शायद इन दोनों
के बीच एक पुल
बनाने का प्रयास कर
रहे थे।
पत्रकारिता
के दौरान उन्होंने उत्तर और दक्षिण भारत
के अनेक प्रमुख समाचारपत्रों
में संपादन कार्य किया। इससे उन्हें दक्षिण
भारत की जीवनशैली और
दर्शन से परिचय मिला।
वे अयोध्या के होने के
कारण विभिन्न आचार्यों — शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, करपात्री जी आदि — से
भी जुड़े रहे।
उनके
जीवन का एक महत्वपूर्ण
पड़ाव था — अमरकंटक स्थित
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के
रूप में तीन वर्षों
तक सेवा देना। इस
दौरान उन्होंने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के
आदिवासी जीवन का गहरा
अध्ययन किया। उनका मानना है
कि इन जनजातीय परंपराओं
में संभवतः पूर्ववैदिक संस्कृति के कुछ चिह्न
आज भी जीवित हैं।
यह दृष्टिकोण हमें सोचने पर
मजबूर करता है —
क्या जिन समुदायों को
हम ‘पिछड़ा’ या ‘विकास से
वंचित’ मान लेते हैं,
उन्हीं में हमारे अतीत
की जड़ें और भविष्य की
दिशा छिपी हो सकती
हैं?
डॉ.
राधेश्याम शुक्ल की यात्रा हमें
यही सिखाती है —
ज्ञान तब पूर्ण होता है जब हम जिज्ञासा से सीखते हैं, सीमाओं को तोड़ते हैं, और विविध ज्ञान-परंपराओं को जोड़ने का साहस करते हैं।